अहिंष्य.... इक बूँद!
आज मैंने एक लाचार बाप,
और एक मजबूर माँ को देखा,
आज मैं देख पाया,
इस कुत्सित सामाजिक दुष्चक्र को,
जो एक पिता को इतना मजबूर कर जाता है,
कि वो हो जाता है,
अत्यधिक मजबूर!
राजा होकर मजबूर,
खुद की बनायी सल्तनत से
बहुत दूर!
हे दुनिया को बेटियों
कभी भी अपने बाप का
दामन न छोड़ना,
इक ज्योति जिसको
जलाकर वो इस क्रूरतम दुनिया
में तूम्हे नाजों से पालकर
एक नन्ही राजकुमारी बनाकर
आने की अनुमति देता है!!
तुम सीता बनो,
वो तुम्हें राम वरेंगे!
अरे विश्वास तो करो जनक पर!
अरे विश्वास तो करो जनक पर!!
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